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Saakhi- Huzur ji ne farmaya ek maine baksha or ek meri sangat ne

जय सियाराम
बोल साचे दरबार की जय
ऐसी ऐसी मेरे लाल तुध बिन कौन करे
अकालगढ़, पाकिस्तान बनने से पहले की बात है | ६६ साल तो पाकिस्तान बने हो गए हैं, उससे भी ८-१० साल पुरानी बात है, कुल ७५ साल लगभग पुरानी बात है |
हुज़ूर जी वहाँ आये हुए थे | दूर दूर से बहुत संगत आई हुई थी | ग्रन्थ साहिब का पाठ हो रहा था , पत्ता भी गिरे तो शोर हो जाए इतनी शान्ति से सब संगत दर्शनों के साथ हुज़ूर जी प्रवचन और ग्रन्थ साहिब का पाठ सुन रहे थे | कुछ समय बाद कई मर्द और औरतें भी आई और आकर चुप-चाप बैठ गई |
हुज़ूर जी ने इशारे से पाठ रुकवा दिया | हुज़ूर जी फरमाते हैं-” एक सवाल लेकर कोई जनानी आई है, आगे आ जाओ |”
कोई भी आगे नहीं आया | फिर से फरमान हुआ-” भाई ग्रन्थ साहिब का पाठ रुकवा कर उसका सवाल निकाला है | जल्दी से आगे आओ |”
फिर भी कोई आगे नहीं आया | अबकी बार जोश में आवाज़ आई-” जो जाटनी आई है गाँव से, आगे आओ | उसके चेहरे पर दाग हैं चेचक के | बड़ी परेशान है |”
सारी निशानी दे दी, अब तो छुपना मुश्किल था | धीरे धीरे सोचती आगे आ रही थी- ” जैसा सुना था वैसा ही पाया है | अंतर की बात तो पकड़ लेते हैं | अब इतनी समर्थ हैं तो मेरी मुश्किल भी दूर करेंगे |”
आगे आ गई, सारी निशानियाँ बाकी संगत ने देख ली | इसके भाग्य बड़े जाग गए हैं, हुज़ूर जी ने पाठ रूकवाकर इसका मसला निकाला है | हुज़ूर जी कहते हैं-” बेटा ! जल्दी से बोल तू क्या चाहती है | “
वो चुप रही, लेकिन अब चुप रहने का समय नहीं था | उस जाटनी ने अपनी २ उंगली उठाई, हुज़ूर जी ने अपनी एक उंगली दिखाई | कई देर तक २ उंगली और एक उंगली चलती रही | सब संगत कुछ भी नहीं समझ पाई, ये क्या हो रहा है ?
इधर अब ये जाटनी सोच रही है कि सर्वशक्तिमान खुश हो रहे हैं, अगर आज भी चुप रही तो ये मुश्किलें,दुश्वारियां सारी ज़िन्दगी दूर नहीं होंगी | कहने लगी-” हुज़ूर जी ! मेरे पति और भाई के हाथों कत्ल हो गया है, सिपाही पकड़ कर ले गएँ हैं | सब कहते हैं कि फांसी होनी लाजिमी है, बस थोड़े समय का फर्क है इधर या उधर | कोई दुसरा रास्ता नज़र नहीं आता | बड़ी दूर से चल कर, आपका बड़ा नाम सुन कर आई हूँ | भाई मेरा इकलोता है | “
हुज़ूर जी कहते हैं-” चल ठीक है ! तू बड़ी दूर से नाम सुनकर आई है, तेरे पति को बरी करवा देते हैं |”
जाटनी-” बड़ी मेहरबानी जी ! भाई मेरा एक है | मां के दांत भी गिरने लगे हैं | उसके बच्चा होना नहीं, मां बाप के साथ-साथ मेरे मां-बाप का नामलेवा नहीं रहेगा | ज़िन्दगी भर मैं किसे रखडी ( राखी ) बाधुंगी ? बताएं जी | मेरा तो माँ का घर ही बंद हो जायेगा मेरे लिए जी |”
हुज़ूर जी-” बात तो ठीक है तेरी | अच्छा ऐसा करते हैं, तेरे भाई को बरी करवा देते हैं | तेरा राखी बांधने में कोई दिक्कतें नहीं आएगी | “
जाटनी-” आप तो दाता हैं, मेरे पिता हैं | मेरा सुहाग चला गया, तो लोग बड़ी बातें बनायेंगे | मैं अपनी ज़िन्दगी कैसे काटूँगी ? किस किस के ताने सुनूंगी ? आपकी बच्ची बेवा हो जाए , आप कैसे देख सकेंगे ? “
हुज़ूर जी-” कह तो रहा हूँ मैं | चल तेरे पति को बचा लेते हैं |”
जाटनी-” मैं कह तो रही हूँ आपसे ! दाता के घर आई हूँ, उसके घर ये कंजूसी !! मैंने दोनों की ही ज़िन्दगी की भीख लेके जाना है |”
हुज़ूर जी-” मैंने कहा तो है , किसी एक को बख्श दिया मैंने | जा |”
सारी संगत नि:शब्द एकटक बैठी इस रोमांच का अलौकिक आनंद उठा रहा थी | आखिर संगत ने हुज़ूर जी से अर्ज की कि आप इसे दोनों बख्श दें |
हुज़ूर जी कहते हैं-” जा बेटी ! एक मैंने बख्शा और एक मेरी संगत ने | मेरी संगत की कोई बात मैं नहीं मोड़ता, पूरी करता ही करता हूँ, भले ही वो लिखे हुए से अलग हो | जा मेरी संगत के जोड़े साफ़ कर |”
वो जाटनी वहाँ पर ही रोते रोते नाचने लगी – ‘” ऐसी ऐसी मेरे लाल तुध बिन कौन करे ” | रोते रोते बाहर गई अपने दुपट्टे से हरेक संगत के जोड़े चूमती है, फिर दुपट्टे से साफ़ किये जा रही है और मूंह से यही बोले जा रही है……..
ऐसी ऐसी मेरे लाल तुध बिन कौन करे……..

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