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Saakhi Karam Taiyar Karlo

यह सौभाग्य मुझे इसी साल 2020 को रविवार 1 मार्च को मिला था | मुझे यह हुक्म भी हुआ था और उसी हुक्म को मानते हुए मैं यह आप सभी के साथ बांट रही हूं | होली आने को थी और हम सभी के प्यारे हुज़ूर जी का जन्मदिन भी बहुत नज़दीक था | सभी संगत अपने दिलों से अरदास कर रही थी कि उन्हें जन्मदिन में शामिल होने का सौभाग्य मिले | यह सही कहा गया है :–

” अपने दर पे बुलाना , ये भी शामिल है तेरी रज़ा में    

मैं आंगनवाड़ी में बच्चों को पढ़ाती हूं और छुट्टी के दिनों में UP में इलेक्शन ऑफिस की तरफ से वोटर्स के नए नाम की रिकॉर्ड में जांच   का काम चल रहा था | यह काम जगाधरी में म्युनिसिपल ऑफिस में होता है | एक कमरे में हम तीन लोग उस काम में लगे हुए थे | हम लोग कुर्सियों में बैठे हुए थे और आगंतुकों के लिए अलग से कुर्सियां रखी हुई थी | बीच में एक बड़ी टेबल भी रखी हुई थी | सुबह 9 बजे से लेकर दोपहर में 2 बजे तक काम चलता रहा | उसके बाद दोपहर के खाने का समय शुरू हो गया | मेरे दो साथी खाना खाने चले गए थे |

उसी समय मेरी भतीजे की बहु पूनम बतरा का फोन आ गया | हम दोनों हुज़ूर बाबा दलीप सिंह जी की चर्चा में लग गए | वो बहुत आनंद का समय व्यतीत हुआ | हुज़ूर जी की चर्चा में दिल की बेचैनी कहाँ गायब हुई, पता ही नहीं चला |

हम दोनों हुज़ूर जी की साखियाँ, उनकी सिफ़तें एक दूसरे को सूना रहे   थे | अभी हमारे आपस में हुज़ूर जी की साखियां चल ही रही थीं, अचानक ही एक बहुत बुलंद आवाज़ हुई मेरे कानों में आई-” पहले पीछे मुड़ के ते वेख (पहले पीछे   मुड़ के तो देख |)|”

उस आवाज़ में इतनी कशिश थी कि मेरे हाथ से फोन गिरते-गिरते बचा | पहले तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह मैंने किसकी आवाज़ सुनी ? लेकिन जब मैंने अपने सामने मुड़ कर देखा कि परम पूज्य हुज़ूर जी सफ़ेद कुर्ते पाजामें में साक्षात सामने खड़े थे और मेरे देखते-देखते कुर्सी पर बैठ गए |

हुज़ूर जी के चेहरे पर बहुत ज़लाल था | इतना कि झेला नहीं जा रहा था   | मैंने अदब से उन्हें सज़दा किया | मैं बहुत घबराई हुई थी | मैं मन ही मन में बोली-” हुज़ूर जी, यहां इस समय कैसे !”

तभी हुज़ूर जी फरमाने लगे–” चल पीछे मुड़ के वेख तू | ओ बन्दा   बिना सब्जी दे, रोटी खांदा पेया है | ओनूं ओत्थे जाके सब्जी लया के दे |   अगर किसे ने वी मैनूं मिलण वास्ते आणा है, ते ओनूं आखीं कि कुझ करम वी अपने लेईं तैयार कर लवो | अपणे हर बंदेया नूं वी जा के कह देवीं के अपणे-अपणे करम तैयार कर लवो | ओस बन्दे नूं कुझ पैसे वी दे देईं | ( चल, तू ज़रा पीछे मुड़ के देख | वो आदमी बगैर सब्जी के रोटी खा रहा है | उसे वहां जाकर सब्जी लाकर दे | अगर कोई भी मुझे मिलने के लिए आना चाहता है, तो उसे कह देना कि कुछ कर्म अपने   लिए तैयार कर लो | अपने हर प्यारे को कह देना कि अपने-अपने कर्म तैयार कर लो | उस आदमी को कुछ पैसे भी दे देना |)”

हुज़ूर जी की यह बात सुनने के बाद मैंने पीछे मुड़ कर देखा | एक बेंच   थी जिस पर एक गरीब मज़दूर बैठा था और उसके हाथ में कपडे बंधी हुई रोटी थी | वो मज़दूर रोटी बगैर किसी सब्जी के खा रहा था | मैंने उससे पूछा–” क्या आपके पास रोटी के साथ खाने के लिए कोई सब्जी नहीं है ?”

उसने बताया-” नहीं | आज हमारे घर सब्जी नहीं बनी | मैडम जी, चार दिन से मुझे कोई भी काम नहीं मिला | मैं घर कुछ भी पैसे लेकर नहीं जा सका | आज जब मैं घर से बाहर निकला, तो मेरे बच्चे ने मुझसे कहा कि पापा मुझे भूख लगी है, आप आज कुछ खाने के लिए अच्छा सा लेकर आना |”

आगे उस मज़दूर ने बताया-” अब मैं घर से निकला हूं, मैं इसी चिंता में था कि अपने बच्चे के लिए क्या ले जा सकूंगा | अभी तो मैं खुद ही रूखी   रोटी खा रहा हूं | भगवान् ने आपको भेजा है, मेरे बच्चे की पुकार सुन कर |”

मैंने हुज़ूर जी के हुक्म अनुसार बाज़ार से सब्जी लाकर उस मज़दूर को   दे दी | उस मज़दूर ने बहुत संतुष्टि से उस सब्जी के साथ रोटी खानी शुरू कर दी | हुज़ूर जी ने मुझे कुछ पैसे उस मज़दूर को देने का दूसरा हुक्म दिया था, मेरे पास उस समय जो हुज़ूर जी की कृपा से संभव बन पड़ा, मैंने हुज़ूर जी का नाम लेकर उस मज़दूर को दे दिया |

उसकी आँखें अश्रु-पूरित थी और मेरी तरफ वो बहुत प्यार से देख रहा   था | उसकी आँखे बहुत कुछ कह रही थीं और उन अव्यक्त भाषा ने हुज़ूर जी का कर्म मुझे समझा दिया |

मैं अब आप सभी हुज़ूर जी की अज़ीम संगत से हुज़ूर जी के उस हुक्म को एक बार फिर से दोहराना चाहती हूं कि आप सभी भी अपने शुभ-कर्म करके हुज़ूर जी मिलने की तैयारी करनी शुरू कर दें | दया के सागर बाबा दलीप सिंह जी ने बहुत ही सरल, सहज तरीका उनसे मिलने का बता दिया है | उस तरीके पर अमल करें और उनसे मिल लें |

बोल साचे दरबार की जय।

जय सिया राम जी।

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