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Saakhi- Karm hi bhakti

मै अपने ताया सरदार पीतम सिंह जी के साथ हुई बात का वर्णन कर रहा हूं।  पाकिस्तान बनने के बाद वे पटियाला के पास एक गांव में रहने लगे। उन दिनों परम पूज्य हजूर जी जयपुर में निवास करते थे।  मेरे ताया जी हजूर जी के प्यारे सेवक थे।   हजूर जी ने चिट्ठी लिखकर उनको अपने पास जयपुर बुलाया।  वह एक गुरुभाई के साथ जयपुर पहुंच गए और कुछ दिन वहां रुके। 
उन दिनों हुज़ूर जी ने एक  बकरी पाल रखी थी। उन्होंने ताया जी व उनके साथी को ड्यूटी बकरी  के लिए आक  के पत्ते लाने की लगा दी।  एक दिन उन्होंने आक के पत्ते लेने जाना था।  तभी उन्होंने  देखा कि हजूर जी डॉ रामलाल जी से हीर  ( रूहानी गीत ) सुन रहे हैं।  उनके मन में विचार आया कि हम भी थोड़ी हीर  सुन कर फिर आक  के पत्ते लेने चले जाएंगे।  इसी विचार से वे दोनों संगत में से पीछे बैठकर हीर सुनने लगे।  
हुजूर जी ने डॉक्टर गुलाब राय को हीर सुनाने से रोक दिया और उनसे पूछा ” तुम लोग यहां कैसे बैठे हो?”  उन्होंने कहा कि हम हीर सुनने लगे थे।  तब हुज़ूर जी ने फ़रमाया ” तुम्हारी हीर वही है जहाँ तुम्हारी ड्यूटी लगाई गई  है।” हुज़ूर जी का हुकुम सुनकर वे दोनो  उनसे अपनी गलती की माफ़ी मांग कर जल्दी से  बकरी के लिए  आक के पत्ते लेने चले गए। 

 जय सिया रामजी।

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