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Saakhi- Transfer aur Tarakki

सन 1961 में परम पूज्य हजूर जी फैजाबाद में रहते थे। उन दिनों मेरे पिता गुरबख्श सिंह ढिल्लो मिलिट्री  में नौकरी करते थे और उनकी पोस्टिंग लखनऊ में थी।  हर शनिवार को वे  हुजूर जी के दर्शन करने के लिए फैजाबाद जाते और रविवार शाम को वापस आ जाते।  इस तरह उनका समय अच्छा बीत रहा था। एक  दिन उनकी  बेंगलुरु बदली के आर्डर हो  गए।  उन्होंने  हुज़ूर जी से अरदास की कि मुझे बैंगलोर  न जाना पड़े ,यहां रहते हुए आपकी कृपा से हर हफ्ते मुझे आपके दर्शन हो जाते हैं और सत्संग भी मिलता रहता है।  अरदास करने के साथ-साथ अपने स्तर पर कोशिश करते रहे कि उनकी बदली रूक जाये  पर कोई फायदा नहीं हुआ। 
बेंगलुरु जाने से पहले वे हजूर जी के दर्शन करने फैजाबाद गए।  हुजूर जी ने फरमाया ” ट्रांसफर रोकने की तेरी अरदास तो मैंने सुन ली ,पर मंजूर नहीं की। ”  मैं जानता हूं कि तुम्हारी वहां जाने पर तरक्की होगी और इसी में तेरी भलाई है।  मैं अपने बच्चे का नुकसान क्यों करूं। इसलिए तुम खुशी-खुशी जाओ। ” हुजूर जी को  मत्था टेक कर दे खुशी से बेंगलुरु चल गए।  बेंगलुरु जाने पर उनकी तरक्की हो गई जिसकी उन्होंने कभी  आशा भी नहीं की थी और इसके कारण रिटायर होने पर उनको बहुत अच्छी पेंशन मिली। 

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